शिवांश और काव्या की शादी को तीन साल हो चुके थे। बाहर से देखने वालों को लगता था कि दोनों की ज़िंदगी बिल्कुल परफेक्ट है—अच्छा घर, अच्छी नौकरी, सम्मानित परिवार। लेकिन हर घर की तरह, इस घर की दीवारों के भीतर भी कुछ अनकही बातें और कुछ अधूरी शिकायतें चुपचाप साँस ले रही थीं।
शिवांश अपने माता-पिता—रमेश और शारदा—के साथ रहता था। रमेश जी रिटायर्ड स्कूल टीचर थे, शांत, समझदार और कम बोलने वाले। शारदा जी, यानी काव्या की सास, स्वभाव से सख्त थीं, लेकिन दिल की बुरी नहीं। बस उनका तरीका थोड़ा पुराना और शब्द थोड़े तीखे थे।
काव्या एक पढ़ी-लिखी, समझदार और संवेदनशील लड़की थी। वह अपने मायके में बहुत खुले माहौल में पली थी, जहाँ हर बात प्यार से कही जाती थी। शादी के बाद उसने इस घर को भी अपना बनाने की पूरी कोशिश की, लेकिन धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि यहाँ उसकी हर कोशिश कम ही पड़ जाती है।
सुबह उठकर सबसे पहले रसोई, फिर पूरे घर की व्यवस्था, फिर ऑफिस जाना, और लौटकर फिर घर के काम—काव्या की ज़िंदगी जैसे एक लगातार चलने वाली दौड़ बन गई थी। शिवांश उसकी मेहनत देखता था, पर शायद उतना समझ नहीं पाता था जितना समझना चाहिए था।
शारदा जी को लगता था कि काव्या काम तो करती है, लेकिन “अपने तरीके से।” उन्हें हर काम में एक नियम, एक तरीका और एक समय चाहिए था। और काव्या को लगता था कि वह चाहे कितना भी अच्छा कर ले, कुछ न कुछ कमी निकाल ही ली जाती है।
एक दिन सुबह काव्या को ऑफिस के लिए जल्दी निकलना था। उसने रात को ही सब तैयारी कर ली थी, लेकिन सुबह अचानक गैस खत्म हो गई। वह जल्दी-जल्दी सब संभालने की कोशिश करने लगी। इसी अफरा-तफरी में नाश्ता थोड़ा देर से बना।
शारदा जी ने घड़ी देखते हुए कहा, “आजकल समय की कोई कद्र ही नहीं रही। घर है या होटल?”
काव्या ने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गई। उसने सिर्फ इतना कहा, “माँ, आज ऑफिस में मीटिंग है, इसलिए थोड़ा लेट हो गया।”
“बहाने तो हर किसी के पास होते हैं,” शारदा जी ने बिना उसकी तरफ देखे कहा।
यह बात काव्या के दिल में चुभ गई। वह बिना कुछ बोले ऑफिस चली गई। रास्ते भर उसकी आँखें भरी रहीं। उसे लगा कि वह चाहे कुछ भी कर ले, इस घर में उसे कभी पूरी तरह अपनाया नहीं जाएगा।
शाम को जब वह लौटी, तो रमेश जी ने मुस्कुराकर पूछा, “थक गई होगी, बेटी?”
उस एक शब्द—“बेटी”—में उसे थोड़ी-सी राहत मिली। लेकिन राहत ज्यादा देर टिक नहीं पाई।
रात के खाने पर शारदा जी ने फिर वही बात छेड़ दी—“आजकल की बहुएँ बस नौकरी को ही सब कुछ समझती हैं।”
शिवांश चुप रहा। वह जानता था कि अगर वह कुछ बोलेगा, तो बात और बढ़ जाएगी। लेकिन उसकी यही चुप्पी काव्या को सबसे ज्यादा तकलीफ देती थी।
उस रात काव्या देर तक सो नहीं पाई। वह छत को देखते हुए सोचती रही—“क्या यही शादी है? क्या यही परिवार है?”
कुछ दिनों बाद एक और बात हुई। काव्या ने मंदिर में रखी आरती की थाली उठाते समय गलती से एक दीया गिरा दिया। दीया बुझ गया और थोड़ी-सी राख फर्श पर फैल गई।
शारदा जी ने झुँझलाकर कहा, “जरा भी ध्यान नहीं रहता। भगवान के काम में भी लापरवाही!”
काव्या ने कुछ नहीं कहा। वह झुककर राख साफ करने लगी, लेकिन उसकी आँखों से आँसू टपककर फर्श पर गिर गए।
रमेश जी यह सब देख रहे थे। उनका दिल भारी हो गया। उन्हें साफ दिख रहा था कि घर में कुछ ठीक नहीं चल रहा।
उस रात उन्होंने शिवांश से कहा, “बेटा, घर सिर्फ ईंट-पत्थर से नहीं बनता। अगर घर के लोग खुश नहीं हैं, तो वो घर नहीं रहता।”
शिवांश ने थकी हुई आवाज़ में कहा, “पापा, मैं कोशिश करता हूँ, लेकिन मम्मी का स्वभाव आप जानते ही हैं। और काव्या भी अब चुप-चुप रहने लगी है।”
रमेश जी बोले, “चुप्पी सबसे खतरनाक होती है। यह धीरे-धीरे रिश्तों को खा जाती है।”
कुछ दिनों बाद काव्या की तबीयत खराब हो गई। तेज बुखार और कमजोरी। फिर भी वह उठकर काम करने की कोशिश कर रही थी।
शारदा जी ने उसे देखा और कहा, “बीमार हो तो बिस्तर पर रहो, यहाँ ड्रामा करने की जरूरत नहीं।”
यह सुनकर काव्या का सब्र टूट गया। वह पहली बार बोली, “माँ, मैं ड्रामा नहीं कर रही। सच में तबीयत ठीक नहीं है।”
शारदा जी ने कहा, “आजकल सबको काम से बचने का बहाना चाहिए।”
काव्या कुछ नहीं बोली। वह चुपचाप कमरे में चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया। अंदर जाकर वह फूट-फूट कर रोने लगी।
शिवांश जब घर आया और उसे कमरे में बंद देखा, तो घबरा गया। उसने दरवाज़ा खटखटाया। “काव्या, क्या हुआ? दरवाज़ा खोलो।”
काव्या ने दरवाज़ा खोला, लेकिन उसकी आँखें सूजी हुई थीं। उसने सिर्फ इतना कहा, “मैं थक गई हूँ, शिवांश। बहुत थक गई हूँ।”
उस रात काव्या ने पहली बार कहा, “मुझे कुछ दिनों के लिए मायके जाना है।”
शिवांश चुप रह गया। वह जानता था कि यह बात यहीं तक आ ही जाएगी। उसने धीरे से कहा, “अगर तुम्हें लगता है कि वहाँ जाकर तुम्हें सुकून मिलेगा, तो चली जाओ।”
अगले दिन काव्या मायके चली गई।
घर अचानक सूना हो गया। शारदा जी को लगा जैसे घर से रौनक चली गई हो। सुबह रसोई में जाकर उन्हें एहसास हुआ कि कोई हल्की आवाज़ में गुनगुनाता हुआ काम नहीं कर रहा, कोई पूछ नहीं रहा—“माँ, चाय में चीनी ठीक है?”
रमेश जी ने शाम को कहा, “शारदा, घर खाली लग रहा है, है न?”
शारदा जी ने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन उनकी आँखें बता रही थीं कि वह भी वही महसूस कर रही हैं।
कुछ दिन बीत गए। काव्या का फोन नहीं आया। शिवांश उदास रहने लगा। घर का माहौल बोझिल हो गया।
एक दिन रमेश जी ने शारदा जी से कहा, “अगर बहू इस घर से चली जाए और वापस न आए, तो यह हमारी हार होगी।”
शारदा जी की आँखों में आँसू आ गए। “मैंने तो कभी उसका बुरा नहीं चाहा।”
“बुरा चाहने और बुरा कर देने में कभी-कभी फर्क नहीं दिखता,” रमेश जी ने धीरे से कहा।
उस रात शारदा जी सो नहीं पाईं। उन्हें काव्या की हर वो बात याद आने लगी जब वह चुपचाप सब सह लेती थी। उन्हें पहली बार लगा कि शायद उन्होंने सख्ती के नाम पर बहुत कुछ कह दिया था।
अगली सुबह उन्होंने खुद काव्या को फोन किया। काफी देर तक फोन नहीं उठा। फिर आवाज़ आई—“जी, माँ।”
उस एक शब्द में इतनी दूरी और इतना दर्द था कि शारदा जी का गला भर आया। उन्होंने कहा, “बेटी, वापस आ जाओ। घर तुम्हारे बिना सूना लग रहा है। अगर मुझसे कोई गलती हुई हो, तो मुझे माफ कर दो।”
काव्या कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “माँ, मैं कभी आपका दिल दुखाना नहीं चाहती थी। बस… मैं भी इंसान हूँ।”
“मुझे पता है, बेटी,” शारदा जी ने काँपती आवाज़ में कहा, “और मैं यह बात समझने में देर कर गई।”
दो दिन बाद काव्या वापस लौटी।
दरवाज़े पर शारदा जी खुद खड़ी थीं। उन्होंने आगे बढ़कर काव्या को गले लगा लिया। “अब इस घर में कोई अकेला नहीं रहेगा।”
काव्या रो पड़ी। उस गले लगने में उसे वो अपनापन मिला, जिसकी उसे बहुत दिनों से जरूरत थी।
रमेश जी ने मुस्कुराकर कहा, “अब हमारा घर फिर से पूरा हो गया।”
शिवांश की आँखों में भी नमी थी। उसने काव्या का हाथ पकड़कर कहा, “मुझे माफ कर देना। मैं तुम्हारे लिए उतना मजबूत नहीं बन पाया जितना बनना चाहिए था।”
काव्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अब आगे सब ठीक हो जाएगा।”
धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। शारदा जी अब बात कहने से पहले सोचने लगीं। काव्या भी खुलकर अपनी बातें रखने लगी। रमेश जी दोनों के बीच पुल बनकर खड़े रहे। और शिवांश ने यह ठान लिया कि वह अब कभी चुप नहीं रहेगा।
कुछ महीनों बाद एक दिन काव्या ने शिवांश को बताया कि वह माँ बनने वाली है। यह सुनकर पूरा घर खुशी से भर गया।
शारदा जी ने उसकी आरती उतारी और कहा, “तू इस घर की रौनक है, बेटी।”
काव्या की आँखों में खुशी के आँसू थे।
वह घर, जो कभी चुप्पी और गलतफहमियों से भारी हो गया था, अब फिर से हँसी से गूँजने लगा था।
क्योंकि आखिरकार सबने यह सीख लिया था कि
घर रिश्तों से बनता है, और रिश्ते प्यार से।
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