अंजली और कबीर की शादी को अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ था, लेकिन दोनों को लगने लगा था कि समय जैसे बहुत जल्दी बदल गया है। शुरुआती महीनों में जिंदगी किसी खूबसूरत कविता की तरह थी। सुबह की चाय साथ, शाम की लंबी बातें, और रात को एक-दूसरे के हाथों में हाथ डालकर सपने देखना—सब कुछ बिल्कुल सही लगता था।
लेकिन शादी के बाद असली जिंदगी धीरे-धीरे अपनी तस्वीर दिखाने लगी। कबीर की नौकरी अचानक बहुत demanding हो गई थी। उसके ऑफिस में नया प्रोजेक्ट आ गया था, और रोज देर रात तक काम करना उसकी मजबूरी बन गया था। उधर अंजली भी अपनी नई नौकरी में खुद को साबित कर रही थी। घर लौटकर दोनों इतने थके होते कि बातें करने का मन ही नहीं रहता। सोफे पर साथ बैठते थे, पर दोनों के मनों के बीच खामोशी की मोटी दीवार आ जाती थी।
अंजली कई बार कोशिश करती कि कबीर से पहले जैसी लंबी बातें करे, उसके दिन के stress को समझे, उसे आराम दे। लेकिन कबीर के चेहरे पर हमेशा थकान की लकीरें उभर जातीं। वह बस इतना कह देता—“कल बात करेंगे, please।” और अंजली चुप हो जाती। उसे लगता था कि कबीर अब उससे दूर होने लगा है, लेकिन इसे कहने की हिम्मत वह जुटा नहीं पाती।
इसी बीच परिवार का दबाव भी बढ़ने लगा। एक दिन कबीर की माँ ने फोन पर कहा—“अरे, अब एक साल होने वाला है शादी को। बच्चा क्यूँ नहीं प्लान कर रहे तुम लोग?” अंजली ने धीरे से कहा कि अभी दोनों काम में बहुत व्यस्त हैं। लेकिन फोन कटते ही उसकी आँखें भर आईं। माँ ने बड़ी आसानी से कह दिया था—“आजकल की लड़कियाँ करियर में ही पड़ी रहती हैं। घर-गृहस्थी का क्या?”
अंजली को लगा कि उसका दर्द, उसकी मेहनत, उसकी जिम्मेदारियाँ… कोई नहीं देख रहा। वह चाहती थी कि कबीर उसके लिए खड़ा हो, उसका पक्ष ले, पर कबीर ने सिर्फ इतना कहा—“माँ को मत दिल पर लिया करो, वो ऐसे ही बोल देती हैं।” यह सुनकर अंजली का मन और टूट गया।
धीरे-धीरे कबीर घर से और दूर होता गया। एक दिन उसकी टीम में नई लड़की शामिल हुई—सना। कबीर देर रात तक उससे काम पर बात करता, कई बार तो घर आते-आते midnight हो जाता। अंजली परेशान हो उठी। उसे लगने लगा कि शायद उसकी जगह किसी और ने ले ली है। लेकिन वह कबीर से सीधे पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी।
एक दिन अंजली ने सोचा कि कबीर को surprise देगी। वह ऑफिस के पास गई। वहाँ उसने कबीर को सना के साथ देखा। वे दोनों हल्का-हल्का हंस रहे थे—पहली बार। और वही हंसी अंजली के दिल में सबसे तेज़ चोट बनकर लगी। उसे याद नहीं था कि आखिरी बार कब कबीर ने उसके साथ इतनी सहजता से हंसा था। वह चुपचाप घर लौट आई। उस रात कबीर जब घर आया तो उसने हल्के-हल्के पूछा, “तुम मेरे साथ खुश नहीं हो अब?”
कबीर हैरान हो गया। “ये कैसा सवाल है?”
“तुम मुझसे दूर होते जा रहे हो, कबीर…”
कबीर गुस्से में आ गया। “तुम्हें मुझ पर शक है? Seriously?”
अंजली रो पड़ी। “शक नहीं… डर लगता है। कहीं तुम्हें अब मेरी जरूरत ही न रही हो।”
उस रात बड़ी लड़ाई हुई और दोनों चुपचाप सो गए—एक-दूसरे से बहुत दूर।
अगले कुछ दिनों में कबीर ने महसूस किया कि अंजली उससे पूरी तरह टूटने लगी है। वह घर में रहती जरूर थी, पर उसकी आँखों में एक गहरी उदासी बस गई थी। उसकी मुस्कान कहीं खो गई थी। और कबीर यह सब देखकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था, क्योंकि वह खुद उलझा हुआ था—काम, माँ का दबाव, अंजली की चुप्पी… और ऊपर से अंजली को गलतफ़हमी हो गई थी कि सना उससे करीब हो रही है।
सना ने एक दिन खुद कबीर से कहा—“सर, आपकी पत्नी आपको गलत समझ रही है। पर ये आपकी गलती है कि आप उन्हें अपनी जिंदगी का हिस्सा नहीं बना रहे।”
कबीर चौंक गया।
सना बोली—“जिसे हम अपना मानते हैं, उससे बातें छुपाई नहीं जातीं। न आप गलत हैं, न आपकी पत्नी। फर्क बस इतना है कि आप दोनों एक-दूसरे से कम बात कर रहे हो।”
कबीर को सना की बातें बहुत लगीं।
उस शाम, जब वह घर लौटा, तो अंजली balcony में बैठी थी। हवा के झोंके उसके बालों को उड़ा रहे थे, पर उसकी आँखों में गहरी थकान थी। कबीर धीरे-धीरे उसके पास आया और बोला—“अंजली, क्या हम बात कर सकते हैं?”
अंजली ने उसकी तरफ देखा, फिर नजरें झुका लीं। कबीर उसके बगल में बैठ गया।
“अंजली… मुझे माफ कर दो। मैं सच में बहुत बदल गया था। काम में इतना खो गया कि यह भी नहीं देखा कि तुम कितनी कोशिश कर रही थीं हमें संभालने की। सना के साथ मेरी कोई personal बातें नहीं, कोई feelings नहीं। वह बस मेरी टीम में है। लेकिन हाँ… एक गलती मैंने की—मैंने तुमसे बातें छुपाईं। और इससे तुम्हें लगा कि मैं दूर हो गया हूँ।”
अंजली की आँखों से आँसू गिरने लगे।
“कबीर, मुझे तुम्हारी मुस्कान तक अजनबी लगने लगी थी। तुम मेरे लिए समय नहीं निकालते थे। मैं तुम्हारे लिए चिंता करती थी, लेकिन तुम ही मुझे अपनी जिंदगी से दूर करने लगे।”
कबीर ने उसका हाथ थाम लिया।
“मैं वादा करता हूँ… अब कभी ऐसा नहीं होने दूँगा। हम फिर से कोशिश करेंगे, अंजली। मैं तुमसे पहले भी प्यार करता था… और आज भी सबसे ज्यादा तुमसे ही करता हूँ।”
अंजली की आँखों में पहली बार उम्मीद की चमक आई।
उसे महसूस हुआ—कबीर सिर्फ़ उसका पति नहीं, उसकी कमजोरी भी है, और उसकी ताकत भी।
अगले दिनों में कबीर ने सचमुच खुद को बदलना शुरू कर दिया। वह समय पर घर लौटने लगा। weekends पर अंजली के साथ बाहर जाने लगा। दोनों रात को चाय लेकर balcony में बैठते और पहले जैसे बातें करते। अंजली भी अब मन की बात दिल में नहीं रखती थी। दोनों ने सीखा—चुप्पी किसी भी रिश्ते की सबसे बड़ी दुश्मन होती है।
धीरे-धीरे उनके बीच की दूरी मिटने लगी, और प्यार फिर से लौट आया—पहले से ज्यादा गहरा, ज्यादा समझदार।
कुछ हफ्तों बाद कबीर ने अंजली से कहा—“चलो कहीं घूमने चलते हैं। बस मैं और तुम।”
दोनों एक शांत-सी जगह छुट्टी मनाने गए। वहाँ पहाड़ों की हवा में, सूरज की गर्माहट में, और एक छोटा-सा कैफे की खिड़की के पास बैठकर अंजली ने फुसफुसाकर कहा—
“कबीर… अब लगता है हमारी जिंदगी फिर से पटरी पर आ गई है।”
कबीर मुस्कुराया।
“तुम साथ हो तो जिंदगी हमेशा पटरी पर रहती है। बस मैं ही कभी-कभी भटक जाता हूँ।”
उनकी हँसी वादियों में गूंज उठी।
यहीं, उसी शाम, कबीर ने अंजली का हाथ पकड़कर कहा—
“अंजली, अगर तुम चाहो… तो हम अब अपने परिवार को आगे बढ़ाने का सोच सकते हैं। लेकिन सिर्फ़ तब—जब तुम तैयार हो। क्योंकि यह फैसला हम दोनों का है, सिर्फ एक का नहीं।”
अंजली की आँखें भर आईं।
वह बोली—“कबीर… अब मैं तैयार हूँ। क्योंकि मुझे डर नहीं, भरोसा महसूस हो रहा है।”
कबीर ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
और उस पल दोनों ने महसूस किया—
रिश्ता तब खूबसूरत बनता है जब दो लोग गलतफहमियों से नहीं, समझ से चलते हैं। प्यार शब्दों से नहीं, प्रयासों से साबित होता है। और साथी वही होता है जो मुश्किलों में भी साथ खड़ा रहे।
अंजली और कबीर की कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई—
बल्कि यहीं से शुरू हुई,
एक नए विश्वास, नई मुस्कान
और नए जीवन के साथ।
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