दादा-दादी और पोते-पोतियों के रिश्ते

पुराने शहर के एक शांत से मोहल्ले में खड़ा था मिश्रा परिवार का घर। बाहर से देखने पर वह घर किसी आम मध्यमवर्गीय परिवार का लगता था, लेकिन उसके भीतर पीढ़ियों की यादें, अनुभव और भावनाएँ साँस लेती थीं। घर के सामने तुलसी का छोटा-सा चौरा था और पीछे एक आँगन, जहाँ सुबह की धूप और शाम की ठंडक साथ-साथ आती थीं। इसी घर में रहते थे दादा हरिनारायण मिश्रा और दादी कमला देवी, जिनकी ज़िंदगी अब उनकी उम्र जितनी ही शांत और गहरी हो चुकी थी।

हरिनारायण मिश्रा कभी रेलवे में अफ़सर हुआ करते थे। समय के पाबंद, अनुशासित और सिद्धांतों के पक्के। रिटायरमेंट के बाद उनकी दुनिया सीमित हो गई थी, लेकिन उनके भीतर का अनुभव आज भी जीवित था। कमला देवी बिल्कुल विपरीत स्वभाव की थीं—ममता से भरी, हर बात को दिल से महसूस करने वाली और हर रिश्ते को जोड़कर रखने वाली। उन्होंने जीवन भर घर और परिवार को प्राथमिकता दी थी और अब भी वही उनका सबसे बड़ा सुख था।

उनका बेटा विनय एक निजी कंपनी में काम करता था। काम का दबाव, बदलती ज़िंदगी और तेज़ रफ्तार ने उसे हमेशा व्यस्त रखा। उसकी पत्नी रीना भी नौकरी करती थी और घर तथा ऑफिस के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती थी। दोनों अपने बच्चों के लिए अच्छा भविष्य चाहते थे, लेकिन समय की कमी अक्सर उन्हें बच्चों के वर्तमान से दूर कर देती थी।

विनय और रीना के दो बच्चे थे—बारह साल का आदित्य और आठ साल की अन्वी। दोनों ही आधुनिक दौर के बच्चे थे। मोबाइल, टैबलेट, ऑनलाइन क्लास और वीडियो गेम उनकी दुनिया का हिस्सा थे। वे तेज़ थे, समझदार थे, लेकिन उनके जीवन में वह ठहराव नहीं था, जो कभी उनके माता-पिता या दादा-दादी के बचपन में हुआ करता था।

दादा-दादी के लिए पोते-पोतियाँ जीवन की सबसे बड़ी खुशी थे। हरिनारायण सुबह अख़बार पढ़ते हुए आदित्य से स्कूल की बातें पूछते और कमला देवी अन्वी के बाल गूँथते हुए उससे दिनभर की बातें सुनतीं। लेकिन बच्चों और बड़ों के बीच एक अदृश्य दूरी भी थी। बच्चों को लगता कि दादा-दादी पुराने ज़माने के हैं और दादा-दादी को लगता कि बच्चे बहुत जल्दी बड़े हो रहे हैं।

समय के साथ यह दूरी और स्पष्ट होने लगी। आदित्य को दादा की लंबी बातें उबाऊ लगतीं और अन्वी को दादी की कहानियाँ बार-बार सुनी-सुनाई सी लगतीं। दादा-दादी यह महसूस करते थे, लेकिन कुछ कहते नहीं थे। वे जानते थे कि समय बदल गया है और बच्चों की दुनिया अलग है।

एक दिन हरिनारायण मिश्रा की तबीयत अचानक बिगड़ गई। हल्का-सा दिल का दौरा पड़ा, जिससे घर में हड़कंप मच गया। विनय और रीना दोनों अस्पताल के चक्कर काटने लगे। बच्चों को पहली बार एहसास हुआ कि दादा-दादी हमेशा यूँ ही नहीं रहेंगे। अस्पताल के उस सफ़ेद कमरे में बैठा आदित्य पहली बार डर गया था।

कुछ दिनों बाद हरिनारायण घर लौट आए, लेकिन डॉक्टर ने उन्हें आराम की सख्त सलाह दी। उनकी दिनचर्या और सीमित हो गई। कमला देवी उनका और ज़्यादा ध्यान रखने लगीं। बच्चों को भी समझाया गया कि दादा को परेशान न करें, लेकिन बच्चों के मन में कई सवाल थे, जिन्हें वे किसी से पूछ नहीं पा रहे थे।

इसी दौरान स्कूल की छुट्टियाँ पड़ गईं। विनय और रीना के पास बच्चों को कहीं भेजने का समय नहीं था, इसलिए बच्चे ज़्यादातर घर में ही रहने लगे। मोबाइल और टीवी के अलावा उनके पास करने को ज़्यादा कुछ नहीं था। कमला देवी यह सब देखतीं और मन-ही-मन सोचतीं कि कैसे बच्चों को अपने पास लाया जाए।

एक दिन उन्होंने अन्वी को अपने पास बैठाया और उसे अपने बचपन की कहानी सुनाने लगीं—कैसे वे मिट्टी के घर में रहती थीं, कैसे पेड़ों पर झूला डालकर खेलती थीं और कैसे दादी उनके लिए कहानियाँ सुनाया करती थीं। अन्वी पहले तो अनमने ढंग से सुन रही थी, लेकिन धीरे-धीरे उसकी रुचि बढ़ने लगी।

उधर हरिनारायण मिश्रा ने आदित्य को अपने पास बुलाया और उसे पुराने एलबम दिखाने लगे। उनमें ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीरें थीं—रेलवे स्टेशन, पुराने दोस्त, और जवान हरिनारायण। आदित्य को पहली बार अपने दादा को सिर्फ एक बूढ़े इंसान की तरह नहीं, बल्कि एक पूरे जीवन वाले व्यक्ति की तरह देखने का मौका मिला।

धीरे-धीरे बच्चों और दादा-दादी के बीच बातचीत बढ़ने लगी। आदित्य ने दादा से पूछा कि उनके समय में दोस्ती कैसी होती थी और अन्वी ने दादी से जाना कि माँ बनने का एहसास कैसा होता है। ये सवाल दादा-दादी के लिए अनमोल थे। उन्हें लगा कि उनका अनुभव अब किसी काम आ रहा है।

इसी बीच स्कूल में आदित्य को एक प्रोजेक्ट मिला—अपने परिवार के इतिहास पर। पहले तो उसे यह उबाऊ लगा, लेकिन फिर उसने दादा-दादी से सवाल पूछने शुरू किए। हरिनारायण मिश्रा ने अपने संघर्ष, अपने फैसलों और अपने पछतावों के बारे में खुलकर बताया। कमला देवी ने अपने त्याग और खुशियों की बातें साझा कीं।

उस प्रोजेक्ट ने आदित्य को बदल दिया। वह अब दादा-दादी को समय देने लगा। अन्वी भी दादी के साथ रसोई में बैठकर छोटे-छोटे काम सीखने लगी। घर में एक अलग-सी गर्माहट लौट आई।

विनय और रीना यह सब देख रहे थे। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने अनजाने में बच्चों और दादा-दादी के बीच दूरी बना दी थी। उन्होंने भी कोशिश शुरू की कि शाम को साथ बैठें, बातें करें और मोबाइल से दूर रहें।

कुछ महीनों बाद हरिनारायण मिश्रा की तबीयत फिर बिगड़ी। इस बार हालत गंभीर थी। पूरा परिवार डर गया। अस्पताल के बाहर बैठे आदित्य और अन्वी पहली बार रो पड़े। अन्वी ने दादी का हाथ कसकर पकड़ लिया और आदित्य दादा के पास जाकर बैठ गया।

कई दिनों के इलाज के बाद हरिनारायण मिश्रा की जान बच गई, लेकिन वे बहुत कमजोर हो गए थे। घर लौटने के बाद उनका बिस्तर खिड़की के पास लगा दिया गया, जहाँ से वे आँगन देख सकते थे। बच्चे रोज़ उनके पास बैठते, पढ़ते, बातें करते और चुपचाप उनका हाथ थामे रहते।

हरिनारायण मिश्रा को लगा कि उनकी ज़िंदगी का सबसे सुंदर समय अब चल रहा है। कमला देवी को भी सुकून था कि उनके पोते-पोतियाँ अब उनके पास हैं—सिर्फ शरीर से नहीं, दिल से भी।

समय बीतता गया। आदित्य किशोर हो गया और अन्वी भी बड़ी होने लगी। लेकिन दादा-दादी के साथ उनका रिश्ता और गहरा हो गया था। वे जानते थे कि यह समय सीमित है, लेकिन यही उसकी कीमत थी।

एक शाम पूरे परिवार ने साथ बैठकर पुराने वीडियो देखे। हरिनारायण मिश्रा ने धीमी आवाज़ में कहा कि इंसान चला जाता है, लेकिन रिश्तों में डाली गई मेहनत रह जाती है। आदित्य और अन्वी ने उस दिन तय किया कि वे अपने दादा-दादी की सीख को कभी नहीं भूलेंगे।

कुछ साल बाद हरिनारायण मिश्रा इस दुनिया से विदा हो गए। घर में सन्नाटा छा गया। कमला देवी टूट-सी गईं, लेकिन पोते-पोतियाँ उनके सहारे बन गए। वे अब उनकी देखभाल वैसे ही करते थे, जैसे कभी उन्होंने की थी।

कमला देवी को अपने जीवन का सबसे बड़ा सुख यही लगा कि उनकी अगली पीढ़ी रिश्तों की कीमत समझती है। उन्होंने एक दिन अन्वी से कहा कि दादा-दादी सिर्फ उम्र नहीं होते, वे जड़ होते हैं—जो परिवार को गिरने नहीं देते।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। आदित्य और अन्वी बड़े होकर भी हर साल उस घर लौटते हैं, आँगन में बैठते हैं और अपने बच्चों को वही कहानियाँ सुनाते हैं। कमला देवी की बातें, हरिनारायण मिश्रा की सीख—सब कुछ पीढ़ियों में बहता रहता है।

उस पुराने घर में आज भी तुलसी का पौधा हरा है, आँगन में धूप आती है और दीवारों में हँसी गूँजती है। क्योंकि दादा-दादी और पोते-पोतियों का रिश्ता समय से बड़ा होता है—वह यादों, प्रेम और संस्कारों से बना होता है, और कभी खत्म नहीं होता।

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